न्यायिक समीक्षा पूरी होने तक केंद्रीय जलविद्युत परियोजनाओं उपकर की अधिसूचनाओं पर तत्काल लगे रोक: अनुराग सिंह ठाकुर

हिमाचल में केंद्रीय जलविद्युत परियोजनाओं पर भूमि राजस्व उपकर से बढ़ेगा बिजली का बोझ: अनुराग सिंह ठाकुर ने जताई चिंता

न्यायिक समीक्षा पूरी होने तक केंद्रीय जलविद्युत परियोजनाओं उपकर की अधिसूचनाओं पर तत्काल लगे रोक: अनुराग सिंह ठाकुर
पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं हमीरपुर लोकसभा सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा जलविद्युत एवं बांध परियोजनाओं पर लगाए गए भूमि राजस्व उपकर को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस निर्णय से बिजली उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा और बिजली दरों में वृद्धि हो सकती है। लोकसभा में यह विषय उठाते हुए अनुराग ठाकुर ने बताया कि हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के माध्यम से भाखड़ा, पौंग और ब्यास-सतलुज परियोजनाओं सहित अंतर-राज्यीय एवं केंद्रीय क्षेत्र की परियोजनाओं पर भूमि राजस्व उपकर लगाया गया है, जिनका संचालन केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा किया जाता है। विद्युत मंत्रालय के लिखित उत्तर के अनुसार, प्रत्येक जलविद्युत परियोजना के औसत बाजार मूल्य का 2 प्रतिशत उपकर निर्धारित किया गया है, जिसे लेकर संबंधित केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों ने कानूनी चुनौती दी है। यह कदम संवैधानिक वैधता, मौजूदा वैधानिक और टैरिफ ढांचे के अनुरूपता तथा उपभोक्ताओं पर संभावित भारी आर्थिक बोझ को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। मंत्रालय के उत्तर में बताया गया कि 1 दिसंबर 2025 की प्रारंभिक अधिसूचना के बाद 2 और 3 फरवरी 2026 को अतिरिक्त अधिसूचनाएं जारी कर सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड, राष्ट्रीय जलविद्युत निगम लिमिटेड, राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम लिमिटेड तथा भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड की परिसंपत्तियों और परियोजनाओं को भी इसके दायरे में लाया गया। इन संस्थानों पर लगाए गए कुल उपकर की राशि लगभग 381.54 करोड़ रुपये एनएचपीसी, 283.74 करोड़ रुपये एसजेवीएनएल, 118.72 करोड़ रुपये एनटीपीसी और 433.15 करोड़ रुपये बीबीएमबी पर निर्धारित की गई है। इस प्रकार कुल मिलाकर 1,217 करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय बोझ इन केंद्रीय परियोजनाओं पर डाला गया है, जो दशकों से राष्ट्रीय संसाधनों और अंतर-राज्यीय सहयोग से निर्मित हैं। विद्युत मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि एसजेवीएनएल, एनएचपीसी, एनटीपीसी और बीबीएमबी ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय, शिमला में इन अधिसूचनाओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की हैं। परियोजना-वार आंकड़ों के अनुसार इस उपकर का सीधा प्रभाव बिजली दरों पर पड़ेगा। चमेरा-2 परियोजना में लगभग 0.30 रुपये प्रति यूनिट, चमेरा-1 में 0.48 रुपये प्रति यूनिट, बीबीएमबी की भाखड़ा, पोंग और ब्यास-सतलुज परियोजनाओं में 433.15 करोड़ रुपये के उपकर के साथ लगभग 0.43 रुपये प्रति यूनिट, नाथपा झाकड़ी में 222.60 करोड़ रुपये के साथ 0.39 रुपये प्रति यूनिट तथा कोलडैम परियोजना में 118.72 करोड़ रुपये के साथ 0.45 रुपये प्रति यूनिट तक का प्रभाव पड़ सकता है। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। यदि कोई परिवार प्रति माह 300 यूनिट बिजली की खपत करता है, तो उसे केवल एक परियोजना के उपकर के कारण ही सालाना लगभग 1,080 से 1,728 रुपये तक अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है। कई परियोजनाओं के सम्मिलित प्रभाव से यह बोझ और अधिक बढ़ सकता है। अनुराग ठाकुर ने कहा कि यह केवल दो सरकारों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि यह करोड़ों उपभोक्ताओं के बिजली बिल से जुड़ा विषय है। यदि इस प्रकार के एकतरफा निर्णय लागू होते हैं, तो हिमाचल सहित अन्य लाभार्थी राज्यों के उपभोक्ताओं पर हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि हिमाचल में स्थित केंद्रीय जलविद्युत परियोजनाएं राष्ट्रीय संपत्ति हैं, जिनका निर्माण देश के संसाधनों और वर्षों के निवेश से हुआ है। इनके वित्तीय ढांचे में बिना व्यापक परामर्श और विधिक प्रक्रिया के एकतरफा बदलाव उचित नहीं है। अनुराग ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश सरकार से मांग की कि न्यायिक समीक्षा पूरी होने तक इस उपकर की अधिसूचनाओं पर तत्काल रोक लगाई जाए, केंद्र सरकार एवं संबंधित राज्यों के साथ समन्वय स्थापित किया जाए तथा इस अवधि में बीबीएमबी और अन्य केंद्रीय उपक्रमों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई न की जाए, ताकि सस्ती और स्थिर जलविद्युत आपूर्ति प्रभावित न हो।