पूर्व केंद्रीय कैबिनेट मंत्री एवं वरिष्ठ सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने तंजानिया के अरुशा में आयोजित 153वीं इंटर-पार्लियामेंटरी यूनियन (IPU) महासभा के दौरान लोकतंत्र एवं मानवाधिकार संबंधी स्थायी समिति की चर्चा में भाग लेते हुए दिव्यांगजनों के अधिकारों और सशक्तिकरण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को मजबूती से रखा।
समिति में समावेशी सामाजिक विकास और दिव्यांगजनों के अधिकारों एवं सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए तैयार किए गए मसौदा प्रस्ताव पर हस्तक्षेप करते हुए अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि दिव्यांगता के अधिकारों को केवल दान, कल्याण अथवा निष्क्रिय सामाजिक नीति के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। यह मौलिक मानवाधिकार, मानवीय गरिमा, समानता और लोकतांत्रिक भागीदारी का विषय है।
अनुराग सिंह ठाकुर ने वैश्विक विधायी विमर्श में भारत के राइट्स ऑफ पर्सन्स विथ डिसैबिलिटीज (RPwD) एक्ट, 2016 को प्रमुखता से रखा। उन्होंने कहा कि भारत का व्यापक कानूनी ढांचा गैर-भेदभाव, सार्वभौमिक सुगम्यता, समान अवसर और समाज में पूर्ण भागीदारी को कानूनी अधिकारों के रूप में सुनिश्चित करता है और यह अन्य देशों के लिए भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है।
उन्होंने कहा कि केवल कागजों पर अधिकार सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं है। इन अधिकारों को पर्याप्त संसाधनों, सुगम संस्थानों और मापनीय परिणामों में परिवर्तित करना आवश्यक है, ताकि दिव्यांगजनों के दैनिक जीवन में वास्तविक और ठोस सुधार दिखाई दे।
अनुराग सिंह ठाकुर ने विश्वभर के सांसदों से अपने विधायी, बजटीय और निगरानी संबंधी अधिकारों का प्रभावी उपयोग करने का आह्वान करते हुए कहा कि दिव्यांगता से जुड़े दृष्टिकोण को सार्वजनिक नीति के प्रत्येक क्षेत्र में मुख्यधारा में शामिल किया जाना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सार्वजनिक परिवहन, आवास, न्याय, डिजिटल परिवर्तन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में समावेशी शासन को संस्थागत रूप दिया जाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि नीति निर्माण और उसके जमीनी क्रियान्वयन के बीच की खाई को पाटने के लिए साक्ष्य आधारित नीतियां, विश्वसनीय एवं अलग-अलग श्रेणियों में उपलब्ध आंकड़े तथा प्रभावी संस्थागत समन्वय जरूरी हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हमारे बारे में लिए जाने वाले निर्णयों में हमारी भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए और यह सिद्धांत संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहिए।
समिति की चर्चा में भारत की सक्रिय भागीदारी को आगे बढ़ाते हुए अनुराग सिंह ठाकुर ने मसौदा प्रस्ताव को अधिक संक्षिप्त, कानूनी रूप से सुसंगत और व्यावहारिक बनाने के लिए भारत की ओर से किए गए प्रमुख हस्तक्षेपों को स्पष्ट किया। कानूनी क्षमता और निर्णय लेने की व्यवस्थाओं से जुड़े प्रावधानों पर भारत ने यह सुनिश्चित करने के लिए संशोधन प्रस्तावित किया कि अभिभावकत्व अथवा संस्थागत व्यवस्था से जुड़े सुधार संबंधित देशों के राष्ट्रीय कानूनी ढांचे के अनुरूप हों। इसका उद्देश्य प्रतिबंधात्मक वैकल्पिक निर्णय व्यवस्था को रोकने के साथ-साथ घरेलू कानूनों के तहत उपलब्ध वैध सहायक व्यवस्थाओं की सुरक्षा करना है।
उन्होंने वित्तीय व्यवहारिकता पर भी जोर देते हुए कहा कि वैश्विक प्रस्तावों में सांसदों को दिव्यांगता-संवेदनशील बजट और पर्याप्त संसाधन आवंटन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन विभिन्न देशों की अलग-अलग संवैधानिक और कानूनी व्यवस्थाओं को देखते हुए एक समान और कठोर बजटीय व्यवस्था निर्धारित करना उचित नहीं होगा।
मसौदा प्रस्ताव को जमीनी क्रियान्वयन की वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने के लिए अनुराग सिंह ठाकुर ने प्रस्ताव के प्रस्तावना एवं कार्यान्वयन संबंधी दोनों हिस्सों में कुल 17 संशोधन प्रस्तुत किए। भारत के संशोधनों का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सिफारिशों को देशों की संप्रभु संवैधानिक एवं घरेलू कानूनी व्यवस्थाओं के साथ समन्वित करना, लचीले लेकिन प्रभावी दिव्यांगता-संवेदनशील बजट को बढ़ावा देना तथा निगरानी प्रणालियों में डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा के मजबूत प्रावधान सुनिश्चित करना रहा।
भारत के प्रस्तावों में देश में लागू नीतियों और व्यवस्थाओं को उचित रूप से प्रतिबिंबित करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और IPU से क्षमता निर्माण, स्वैच्छिक रिपोर्टिंग तथा विकासशील देशों के लिए सुगम एवं सहायक तकनीकों की समान और न्यायसंगत उपलब्धता को प्राथमिकता देने का आग्रह भी किया गया।
अनुराग सिंह ठाकुर ने बहुपक्षीय संसदीय कूटनीति में भारत की सक्रिय और रचनात्मक भूमिका को रेखांकित करते हुए मसौदा तैयार करने वाले सह-प्रतिवेदकों के प्रयासों की सराहना की और सदस्य देशों की संसदों से संतुलित, व्यावहारिक एवं अधिकार-आधारित दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसे सुगम, सम्मानजनक और बाधामुक्त विश्व के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है, जहां दिव्यांगजन केवल कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी नहीं, बल्कि समान अधिकारों वाले भागीदार और सामाजिक, आर्थिक एवं लोकतांत्रिक प्रगति को आगे बढ़ाने वाले सक्रिय नेतृत्वकर्ता हों।