लोकतांत्रिक संवाद और शास्त्रार्थ भारत की सभ्यतागत परंपरा का अभिन्न हिस्सा, पश्चिम से आयातित अवधारणा नहीं: अनुराग सिंह ठाकुर

विधि छात्रों से बोले अनुराग सिंह ठाकुर - न्याय और कानून के निर्माण में रचनात्मक बहस की महत्वपूर्ण भूमिका, धर्म आधारित न्यायशास्त्र में शब्द सत्य और कर्तव्य की सेवा के माध्यम बनें दिल्ली विश्वविद्यालय में अभिव्यक्ति 1.0 के समापन समारोह को किया संबोधित, भारत की सभ्यतागत दृष्टि को कानून और सार्वजनिक नीति में पुनर्स्थापित करने का आह्वान

लोकतांत्रिक संवाद और शास्त्रार्थ भारत की सभ्यतागत परंपरा का अभिन्न हिस्सा, पश्चिम से आयातित अवधारणा नहीं: अनुराग सिंह ठाकुर
पूर्व केंद्रीय कैबिनेट मंत्री एवं लोकसभा सांसद अनुराग सिंह ठाकुर ने दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय के 5 वर्षीय एकीकृत विधि पाठ्यक्रम द्वारा आयोजित अभिव्यक्ति 1.0 एशियन पार्लियामेंट्री डिबेट प्रतियोगिता के समापन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि लोकतांत्रिक विमर्श, संवाद और खुली बहस भारत की सभ्यतागत चेतना का अभिन्न हिस्सा रहे हैं, इन्हें पश्चिम से आयातित अवधारणा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। अभिव्यक्ति 1.0 का आयोजन विधि संकाय की साहित्यिक एवं वाद-विवाद सोसाइटी द्वारा किया गया था और इसका उद्देश्य तर्कपूर्ण, सूचनापरक एवं रचनात्मक संवाद को प्रोत्साहित करना था। कार्यक्रम की केंद्रीय थीम डिकोलोनाइजिंग डिस्कोर्स: समकालीन नीति में भारत की सभ्यतागत विरासत की पुनर्प्रतिष्ठा का उल्लेख करते हुए अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि भारत में संवाद और सहभागी शासन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। उन्होंने वैदिक सभा और समिति जैसी संस्थाओं तथा चोल काल के उथिरमेरूर अभिलेखों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की शासन परंपरा में विकेंद्रीकरण, सहभागिता और सहमति आधारित निर्णय की अवधारणाएं लंबे समय से विद्यमान रही हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय विश्वविद्यालयों और बौद्धिक संस्थानों को केवल यूरोकेन्द्रित दृष्टिकोण तक सीमित रहने के बजाय स्व-बोध की भावना के साथ भारत की अपनी ज्ञान परंपराओं को समझना चाहिए। न्याय, तर्क और लोक कल्याण पर आधारित भारतीय चिंतन परंपराओं को आधुनिक सार्वजनिक विमर्श, कानून और नीति निर्माण से जोड़ा जाना आवश्यक है। अनुराग सिंह ठाकुर ने अभिव्यक्ति की शक्ति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय धर्मपरंपरा में वाक केवल तर्क प्रस्तुत करने का माध्यम नहीं, बल्कि सत्य और धर्म की स्थापना का साधन माना गया है। उन्होंने विधि के विद्यार्थियों से कहा कि न्यायालय में बोले गए शब्दों का प्रभाव केवल उस समय की बहस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि न्यायिक व्याख्याओं और कानूनी नजीरों के माध्यम से समाज के व्यापक वर्ग को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने शास्त्रार्थ की भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में बहस का उद्देश्य व्यक्तिगत अहं की संतुष्टि नहीं, बल्कि सत्य की खोज रहा है। वादे वादे जायते तत्त्वबोधः की भावना के माध्यम से उन्होंने विद्यार्थियों को निरंतर संवाद, प्रश्न और तर्क के माध्यम से सत्य तक पहुंचने का संदेश दिया। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन का उल्लेख करते हुए अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि समाज को परस्पर विरोधी व्यक्तिगत हितों के समूह के रूप में नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए समग्र तंत्र के रूप में समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विधि के विद्यार्थियों और भावी विधि विशेषज्ञों को अधिकारों के साथ कर्तव्यों के संतुलन को भी समान महत्व देना चाहिए। उन्होंने देश की सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने के लिए एक भारत श्रेष्ठ भारत के अंतर्गत आयोजित काशी तमिल संगमम और सौराष्ट्र तमिल संगमम जैसे कार्यक्रमों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास देश के विभिन्न क्षेत्रों, भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संवाद और आपसी समझ को मजबूत करते हैं। देश में वामपंथी उग्रवाद के संदर्भ में अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि केंद्र सरकार के अनुसार वर्ष 2018 में 126 जिलों से घटकर दिसंबर 2025 तक वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों की संख्या आठ रह गई थी, जबकि तीन जिले सर्वाधिक प्रभावित श्रेणी में थे। उन्होंने सशस्त्र उग्रवाद में कमी के साथ वैचारिक स्तर पर समाज में विभाजन और अराजकता पैदा करने वाले प्रयासों को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने वैचारिक नक्सलवाद शब्द का प्रयोग करते हुए आरोप लगाया कि कुछ लोग विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में भारत की पहचान और इतिहास को कमजोर करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यतागत पहचान को नकारने वाली मानसिकता विकसित भारत के निर्माण की भावना के अनुरूप नहीं हो सकती। अनुराग सिंह ठाकुर ने विद्यार्थियों के सामने तीन शब्दों का मंत्र रखते हुए कहा कि शस्त्र देश की सुरक्षा के लिए, शास्त्र समाज के मार्गदर्शन के लिए और शास्त्रार्थ सत्य की खोज तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण के लिए आवश्यक हैं। न्याय व्यवस्था के व्यावहारिक पक्ष पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि विधि व्यवसाय में बहस केवल न्यायालय में तर्क प्रस्तुत करने की कला नहीं है, बल्कि substantive justice सुनिश्चित करने और कानून की दिशा को प्रभावित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि युवा विधि विशेषज्ञों को अपनी अभिव्यक्ति, व्याख्या और तर्क क्षमता का उपयोग समाज के व्यापक हित में करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मजबूत वकालत और तार्किक संवाद के माध्यम से युवा विधि विशेषज्ञ सभ्यतागत ज्ञान को प्रभावी सार्वजनिक नीति, कानून और नैतिक ढांचे में परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे व्यक्तिगत अधिकारों के साथ नागरिक कर्तव्य को भी सार्वजनिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाएं। अपने संबोधन के समापन पर अनुराग सिंह ठाकुर ने भावी विधि विशेषज्ञों से अपने पेशे को एक पवित्र दायित्व के रूप में स्वीकार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कानून और तर्क की शक्ति का उपयोग समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और अवसर पहुंचाने, अंत्योदय की भावना को साकार करने तथा भारत को वैश्विक स्तर पर नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए किया जाना चाहिए।